गलत आंकडे पेश कर लिया पुरस्कार
गलत आंकडे पेश कर लिया पुरस्कार
सीताराम ठाकुर, भोपाल । एक जिले के कलेक्टर ने राष्टÑीय जल पुरस्कार पाने के लिए एआई का इस्तेमाल कर गलत आंकडेÞ केंद्र सरकार को भेज दिए और केंद्र ने भी उसका परीक्षण किए बिना पुरस्कार बांट दिया। यह पुरस्कार पाकर कलेक्टर महाशय को चारों तरफ से बधाईयां मिलने लगी। इससे वह फूले नहीं समाएं, लेकिन अब सोशल मीडिया पर पुरस्कार को लेकर तीखी बहस छिड़ी हुई है। क्योंकि जल संरक्षण जैसे संवेदनशील विषय पर देश के सर्वोच्च स्तर का सम्मान राष्टÑपति के हाथों प्रदान किया गया है। इस मामले में एक आईएएस अफसर की भूमिका संदिग्ध बताई जा रही है। उक्त आईएएस जिला पंचायत में सीईओ हैं । उन्होंने एआई के माध्यम से तस्वीरें अपलोड करवाई और पुरस्कार पाने में सफलता पाई। हालांकि लपेटे में कलेक्टर भी आ रहे हैं और अगली प्रशासनिक सर्जरी में कलेक्टर और सीईओ को चलता कर दिए जाने की संभावना है।
टेंडर में खुल गई साहब की पोल
प्रदेश में पीपीपी मॉडल से खोले जा रहे मेडिकल कॉलेजों के टेंडर में विभाग को चलाने वाले साहब की पोल उस समय खुल गई, जब उनके एक चहेते डॉक्टर ने टेंडर में भाग लिया। वैसे डॉक्टर मेडिकल पेशे से जुडेÞ हैं, लेकिन पिछले कुछ समय से उनकी नजदीकी विभाग के मुखिया से हो गई। इस कारण उन्हें लगा कि टेंडर उनको ही मिलेगा, जबकि मेडिकल कॉलेज खोलने के लिए टेंडर अन्य कारोबारियों ने भी डाला था। यहां यह सवाल उठ रहा है कि पेशे से कारोबारी होने के बावजूद डॉक्टर साहब के पास टेंडर डालने के लिए एक हजार करोड़ रुपए की व्यवस्था किसने कराई, क्योंकि डॉक्टर साहब इतने बडेÞ कारोबारी नहीं हैं, जो इतनी राशि जुटा सकें। इसमें एक सीनियर आईएएस के पार्टनरशिप की बू आ रही है, लेकिन कम राशि का टेंडर डालने की वजह से लाटरी अन्य कारोरी के हाथ लग गई। वैसे डॉक्टर साहब राजनीतिक रसूख भी रखते हैं। अब चर्चा यह है कि डॉक्टर साहब का राजनीतिक रसूख में काम नहीं आया?
साहब बार-बार चले जाते हैं विदेश
एक एसीएस स्तर के अफसर की इन दिनों बार-बार विदेश यात्रा पर जाने की चर्चा खूब हो रही है। पीएस से एसीएस बनने के बाद साहब ने जबसे इस महत्वपूर्ण विभाग कमान संभाली है, तबसे वे तीन बार विदेश यात्रा पर घूम आए। हर बार साहब 8 से 10 दिन की विदेश यात्रा पा जाते हैं, जिससे उनके विभाग का काम तो प्रभावित होता ही हैं, बल्कि तीन अन्य विभागों में भी इसका असर पड़ता है। कुछ दिलजले अब साहब के पीछे पड़ गए है कि ये बार-बार विदेश यात्रा पर क्यों जा रहे हैं। कुछ चहेतों ने बताया कि साहब विदेश में अपना निवेश कर रहे हैं, इसलिए व्यवस्था जमाने के लिए जाते हैं तो कुछ का कहना है कि साहब के बच्चे विदेश में पढ़ रहे हैं। मामला कुछ भी हो लेकिन साहब की विदेश यात्रा को लेकर बडेÞ साहब भी कुछ खूश नहीं है। बताया जाता है कि आने वाले समय में साहब के ‘पर’ कतरे जा सकते हैं, क्योंकि साहब के दोनों हाथों में सोने के लठ्डू हैं, जिसकी चर्चा मंत्रालय में हो रही है।
चंदा उगाई में जुटे साहब
एक संभाग के कमिश्नर साहब के सुपुत्र की शादी है। लेकिन साहब शादी की तैयारियों की बजाय आजकल निरीक्षण-निरीक्षण का खेल खेल रहे हैं। वे अपने मातहत आने वाले जिलों में निरीक्षण करने पहुंच जाते हैं और सुबह-सुबह आबकारी, पीडब्ल्यूडी, खनिज आदि के अफसरों को कमरे में तलब करते हैं। अंदर क्या बात हुई, यह तो किसी को पता नहीं रहती है? लेकिन बाहर आकर अफसर भी ठेकेदारों से कहने लगते हैं कि भाई कमिश्नर साहब के यहां शादी है, कुछ तो इंतजाम करना पडेÞगा? वैसे शादी के बहाने वसूली की यह अच्छी ट्रिक है। वैसे साहब ने एक मीटिंग में कह दिया था कि ‘यहां तो कोई मूंगफली की भी नहीं पूछता’,लेकिन अब साहब अपने मातहतों के जरिए शादी के नाम पर ठेकेदार और इंजीनियरों से चंदा उगाई में जुटे हुए हैं और इस काम के लिए उनके कुछ चहेते फील्ड के अफसर काम में लगे हुए हैं, जिसकी चर्चा प्रशासनिक गलियारों में सुनाई दे रही है।
सिंधिया के मंत्रियों ने दिलाई छूट
राजनीति जैसी दिखती है, वैसी होती नहीं है। ग्वालियर मेले में वाहनों को टैक्स से छूट दिए जाने के लिए केंद्रीय मंत्री सिंधिया ने मुख्यमंत्री को करीब एक माह पहले पत्र लिखा था, लेकिन इसके बावजूद टैक्स से छूट दिए जाने का निर्णय नहीं लिया जा सका। पिछली कैबिनेट जब मामला आया तो वाहनों को टैक्स से छूट देने पर सरकार को 250 करोड़ का नुकसान होने की बात अफसरों ने रखी, लेकिन सिंधिया समर्थक मंत्रियों को यह बात रास नहीं आई। वे ‘महाराज’की मांग के लिए अड़ गए। इनके एक मंत्री ग्वालियर क्षेत्र से आते हैं तो दूसरे जिले के प्रभारी मंत्री हैं। अफसरों ने जीएसटी का हाल बता औचित्य पर सवाल उठाए और बताया कि छूट का दुरुपयोग हुआ है, व्यापार को कोई लाभ नहीं हुआ। लेकिन महाराज के मंत्रियों के आगे सारे प्रयास असफल रहे और फिर ‘सरकार’ने हस्तक्षेप कर छूट के प्रस्ताव को कैबिनेट से मंजूरी दिलवा दी। असल में यह मामला अकेले ग्वालियर से नहीं जुड़ा था, बल्कि उज्जैन में भी मेला छूट देनी थी। इसलिए दोनों जगह छूट ले ली गई। अब इसकी वाहवाही लूटने की होड़ मची हुई है?

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