जजों के खिलाफ कार्रवाई इतनी मुश्किल क्यों?
नई दिल्ली। न्यायपालिका की स्वतंत्रता और न्यायिक जवाबदेही को लेकर देश में एक बार फिर बहस तेज हो गई है। न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के इस्तीफे के बाद यह सवाल प्रमुखता से उठ रहा है कि आखिर जजों के खिलाफ कार्रवाई करना इतना कठिन क्यों होता है, जबकि सरकारी अधिकारी और मंत्री आरोप लगते ही जांच, गिरफ्तारी और मुकदमों का सामना करते हैं।
जस्टिस वर्मा पर गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे। दिल्ली हाईकोर्ट में तैनाती के दौरान उनके सरकारी आवास के आउटहाउस से कथित तौर पर करोड़ों रुपये के जले नोट मिलने के बाद मामला चर्चा में आया। सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय जांच समिति ने उन्हें दोषी मानते हुए हटाने की सिफारिश की थी। हालांकि उन्होंने जांच प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जिसे खारिज कर दिया गया। बाद में उन्हें हटाने के लिए संसद में प्रस्ताव लाने की तैयारी हुई, लेकिन उनके इस्तीफे के बाद मामला स्वतः निष्प्रभावी हो गया।
दरअसल विशेषज्ञ बताते हैं कि भारत में न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया बेहद जटिल है। आम बोलचाल में इसे “महाभियोग” कहा जाता है, हालांकि संविधान में यह शब्द नहीं है। किसी उच्च न्यायालय या सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना आवश्यक होता है। अब तक देश के इतिहास में किसी भी जज को इस प्रक्रिया के जरिए पद से नहीं हटाया जा सका है। केवल न्यायमूर्ति सौमित्र सेन के खिलाफ राज्यसभा में प्रस्ताव पारित हुआ था, लेकिन लोकसभा में विचार से पहले ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया था।
दरअसल, न्यायपालिका को यह विशेष सुरक्षा संविधान निर्माण के समय दी गई थी। बताया जाता है कि तत्कालीन फेडरल कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल को पत्र लिखकर न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने की मांग की थी। पटेल ने जवाब में कहा था कि न्यायाधीश लोकतंत्र के “नैतिक अभिभावक” होंगे, इसलिए उन पर सामान्य प्रशासनिक निगरानी की आवश्यकता नहीं होगी। इसी सोच के चलते भ्रष्टाचार निरोधक कानूनों में न्यायपालिका के लिए अलग दृष्टिकोण अपनाया गया।
हालांकि भारतीय दंड संहिता की धारा 21 के तहत न्यायाधीश “जन सेवक” माने जाते हैं। 1991 के चर्चित के. वीरास्वामी मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने स्पष्ट किया था कि उच्च न्यायालय या सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने से पहले भारत के मुख्य न्यायाधीश की अनुमति आवश्यक होगी। इसे न्यायिक स्वतंत्रता की सुरक्षा के तौर पर देखा गया।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब यह व्यवस्था बनाई गई थी, तब यह कल्पना नहीं की गई थी कि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार जैसी समस्या व्यापक रूप ले सकती है। लेकिन अब समय के साथ न्यायिक जवाबदेही, पारदर्शिता, लंबित मामलों और सूचना के अधिकार जैसे मुद्दों पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। जस्टिस वर्मा प्रकरण ने इस बहस को फिर केंद्र में ला दिया है कि क्या केवल इस्तीफा देकर गंभीर आरोपों से बच निकलना उचित माना जा सकता है।

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