दो महिला आईएएस फिर भिड़ीं
दो महिला आईएएस फिर भिड़ीं
सीताराम ठाकुर
मंत्रालय में एक ही विभाग में पदस्थ दो महिला आईएएस अफसरों का विवाद शांत नहीं हो रहा है। इनमें एक महिला आईएएस सचिव के पद पर पदस्थ है, तो दूसरी महिला आईएएस अपर सचिव। एक फाइल को लेकर इन दोनों में काफी विवाद हुआ। इसके पहले एक विभागाध्यक्ष कार्यालय में भी एक महिला कमिश्नर और दूसरी अपर आयुक्त के पद पर पदस्थ थीं, तब कमीशन को लेकर इन दोनों में विवाद हुआ था। इस विवाद के बाद अपर सचिव स्तर की महिला अधिकारी ने अपना ट्रांसफर करवा लिया था और उन्होंने जिस विभाग में अपना ट्रांसफर करवाया, उसी में सचिव बनकर उक्त महिला कमिश्नर भी पदस्थ हो गईं। अब इन दोनों के विवाद को लेकर मंत्रालय में चटकारे लेकर कर्मचारी चर्चा करते नजर आ रहे हैं। वैसे पहले से ही इस विभाग में एक आईपीएस महिला अधिकारी पदस्थ हैं और इनके कड़कमिजाज की वजह से कर्मचारी पहले से ही घवराए हुए थे। अब एक महिला आईएएस के पदस्थ होने और उनके व्यवहार से परेशान होकर कर्मचारियों ने उनसे मिलना भी कम कर दिया है, जिसकी चर्चा मंत्रालय से बाहर आने लगी है।
खेती-किसानी में भी प्रमोशन का गोरखधंधा
खेती-किसानी से जुडेÞ एक विभाग में 18 उप संचालक स्तर के अधिकारियों की (डीई)यानि विभागीय जांच चल रही है, इसके बाद भी मंत्रालय में बैठे अफसरों ने उन्हें क्लीनचिट देते हुए संयुक्त संचालक के पद पर प्रमोट कर दिया। ऐसे ही एक मामले में सचिव ने 18 सहायक संचालक और उप संचालकों का ट्रांसफर कर भोपाल से बाहर भेज दिया था, लेकिन एक अधिकारी पूर्व मंत्री के रिश्तेदार हैं और उन्होंने दबाव डलवाकर अपना ट्रांसफर केंसिल करवा लिया। दूसरे अधिकारी एक पूर्व एमएलए के रिश्तेदार हैं और उनसे उर्वर का काम वापस लेने के लिए उच्च स्तर से आदेश भी जारी कर दिए गए, लेकिन ये अधिकारी इतने पावरफुल हैं कि संचालक और सचिव की भी इनके आगे बोने लगते हैं। विभाग में अफसरों की आपस में चल रही खींचतान की वजह से निचले स्तर के कर्मचारियों और अधिकारियों ने काम करने में रुचि लेना कम कर दिया हैं। वे भी इस विवाद को बडेÞ चाव से देख रहे हैं। उधर, मंत्रालय में बैठने वाले अफसर को इससे कुछ लेना-देना नहीं है?
बडे साहब के जाते ही गिनाने लगे खामियां
मप्र के प्रशासनिक मुखिया के पद पर करीब डेढ़ साल पदस्थ रहे एक सीनियर आईएएस के दिल्ली जाते ही अब जूनियर अफसर उनकी कमियां गिनाने लगे हैं। वैसे जब तक ये बडेÞ साहब मप्र में पदस्थ रहे, तब तक इन अफसरों की जुवान तक नहीं खुलती थी, अब उनकी खामियां और गलितयों को गिनाने में लग गए हैं। कोई ई-फाइल में कमी निकाल रहा है, तो कोई समृद्ध मप्र-2047 के रोडमैप पर खामियां निकाल रहा हैं। हालांकि जब तक ग्वालियर में पैदा हुए बडेÞ साहब मप्र में रहे, प्रमोटी अफसरों को कलेक्टरी मिलना मुश्किल हो गया। कई अफसरों के नाम मुख्यमंत्री सचिवालय से आने के बाद उनके नाम बडेÞ साहब ने काट दिए, जिसके कारण उन्हें कलेक्टरी की सुख नहीं मिला। कुछ अफसरों के नाम सीएम ने खुद भेजे, लेकिन उन्हें भी दूसरे डिपार्टमेंट में पदस्थ कर अपनी दमदारी का दंभ दिखाते रहे, लेकिन ये बडेÞ साहब दिल्ली के लिए जैसे ही रवाना हुए प्रमोटी अफसरों की बांछे खिल गर्इं, अब उन्हें नए बडेÞ साहब से उम्मीद जागी है कि उन्हें कलेक्टरी जरूरी मिलेगी?, इस चक्कर में एक महिला आईएएस ने तो करीब दो महीने से अपनी नई पोस्टिंग पर ज्वाइनिंग भी नहीं दी। अब देखना यह है कि नवागत बडेÞ साहब सरकार में क्या गुल खिलाते हैं?
इंटेलिजेंस चीफ की नियुक्ति को लेकर कवायद तेज
अगले महीने प्रदेश के नए इंटेलिजेंस चीफ की नियुक्ति को लेकर पुलिस महकमे में हलचल तेज हो गई है। चार वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी इस प्रतिष्ठित पद की दौड़ में बताए जा रहे हैं। इनमें 1993, 1997, 1998 और 2000 बैच के अधिकारी प्रमुख दावेदार माने जा रहे हैं। वरिष्ठता, अनुभव और सरकार के भरोसे के आधार पर किसे जिम्मेदारी मिलेगी, इसे लेकर पुलिस मुख्यालय से लेकर मंत्रालय तक चर्चाओं का दौर जारी है। हालांकि राज्य पुलिस सेवा से आईपीएस पदोन्नति की डीपीसी की बैठक से पहले एक वरिष्ठ अधिकारी को लेकर बधाइयों का दौर शुरू हो गया था, लेकिन उनके खिलाफ लंबित विभागीय जांच के कारण उनका मामला सीलबंद लिफाफे में चला गया और पदोन्नति टल गई। वैसे इस अधिकारी ने आईपीएस बनने से पहले ही मुख्यालय में मिठाई बंटवा दी, लेकिन जैसे ही डीपीसी के बाद रिजर्ल्ट सामने आया तो उनके अरमानों पर पानी फिर गया। अब ये अगली डीपीसी में अपनी डीई क्लीयर करवाने की जुगाड़ में भिड गए हैं, देखना ये है कि समय रहते इनकी डीई समाप्त होती है या नहीं?
सुपर स्पेशिलिटी खोलने रुचि नहीं दिखा रहे निवेशक
स्वास्थ्य विभाग में एक सरकारी अस्पताल में एमआरआई मशीन लगाने का मामला भी सुर्खियों में है। बताया जाता है कि निजी निवेशक के साथ एमओयू होने और करोड़ों रुपए की मशीन का आॅर्डर दिए जाने के बाद विभाग ने स्थान को अनुपयुक्त बताते हुए पीछे हटने का निर्णय लिया। मामला अब अदालत तक पहुंच गया है। विभागीय कार्यप्रणाली और निवेशकों के प्रति रवैये को लेकर सवाल उठ रहे हैं तथा अधिकारी पुरानी फाइलों और नोटिंग्स खंगालने में जुटे हैं। ऐसे में मप्र में सुपर स्पेशिलिटी अस्पताल खोलने की मंशा रखने वाले निवेशक पीछे हटने को मजबूर हैं, क्योंकि इससे पहले उन्होंने प्रदेश में सुपर स्पेशिलिटी अस्पताल खालने सरकार के साथ खूब एमओयू किए, लेकिन सरकार की नीतियों और अफसरों की ढुलमुल रवैया के कारण मप्र में निवेश करने में रुचि लेना कम कर दिया है। हालांकि पिछले दो दशक में इक्का-दुक्का ही सुपर स्पेशिलिटी प्रदेश में खुल सके हैं।

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