पीएस और महिला अफसर में ठनी
पीएस और महिला अफसर में ठनी
सीताराम ठाकुर मंत्रालय में पदस्थ एक प्रमुख सचिव स्तर के अधिकारी की अपने ही अधीनस्थ पदस्थ महिला आईएएस अपर सचिव से पटरी नहीं बैठ रही है। उक्त महिला अधिकारी को हटवाने के लिए पीएस ने मुख्यमंत्री के एसीएस, मुख्य सचिव और जीएडी पीएस से भी हटाने का आग्रह किया, लेकिन अभी तक महिला अफसर का पीएस बाल भी बांका नहीं कर पाए हैं? इस विवाद के चलते विभाग के कर्मचारी भी खूब मजे लेकर चर्चा कर रहे हैं। वैसे एक दिन कर्मचारियों ने महिला अधिकारी से जाकर कहा-साहब ने आपको हटवाने की पूरी व्यवस्था कर ली है? आदेश तैयार हो गया है, एक-दो दिन में आदेश जारी हो जाएंगे, लेकिन ऊपर बैठे अफसर भी इस विवाद का आनंद ले रहे हैं। इस विवाद की वजह पीएस द्वारा अपनी मनमर्जी से किए जाने वाले ट्रांसफर, कोर्ट में पेंडिंग मामलों में जवाब और फंड की मंजूरी देने में महिला अफसर से प्रस्ताव नहीं बुलाने, बल्कि सीधे अवर सचिव से आदेश जारी करवाने से हुआ है। इस विवाद के चलते महिला अफसर भी विभाग से निकलने के लिए हाथ-पैर मार रहीं हैं, वह भी चाहती है कि उनकी पोस्टिंग किसी महत्वपूर्ण विभाग में हो जाए।
‘मैडम आपकी क्या सेवा करें’ में फंसी...
एसडीएम दफ्तर में 30 हजार रुपए की रिश्वत की आंच अब सीधे महिला आईएएस तक पहुंच गई है। हाल ही में उनका यूपीएससी 2025 में सिलेक्शन हुआ है, ऐसे में मामला अब प्रदेश से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच गया है। गौरतलब है कि 14 मई को उनके स्टेनो सौरभ यादव को ईओडब्ल्यू ने तेंदूखेड़ा एसडीएम कार्यालय में 30 हजार रुपए की रिश्वत लेते रंगे हाथों गिरफ्तार किया था। कार्रवाई के दौरान कथित तौर पर वह यह कहते सुनाई दिया कि 30 हजार में 5 हजार उसके और 25 हजार ‘एसडीएम मैडम’ के हैं। ट्रैप से पहले शिकायतकर्ता ने एसडीएम से पूछा था-‘मैडम आपकी क्या सेवा करें?’ इस पर उन्होंने सीधे कोई जवाब नहीं दिया। लेकिन बाबू के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा-जितनी श्रद्धा है, आप कर दीजिए।इसकी आॅडियो रिकॉर्डिंग भी जांच एजेंसी के पास है। इस मामले में महिला आईएएस ने कहा कि रिश्वत उनके बाबू ने ली, उन्होंने नहीं। उन्होंने कहा-जब मेरा किसी तरह का लेन-देन ही नहीं हुआ तो मुझे आरोपी कैसे बनाया जा सकता है?वैसे सरकार ने अभी तक उक्त नवगत आईएएस के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की है। मैडम का मामला ईओडब्ल्यू की जांच रिपोर्ट तय करेगा कि उन्हें फंसाया गया है या उनकी रिश्वत लेने में मौन स्वीकृति थी?
मुखिया की कुर्सी पाने की जुगाड़ तेज
मप्र के मुख्य सचिव के पद से 89 बैच के आईएएस अनुराग जैन का रिटायरमेंट 31 अगस्त को है। उनके नीति आयोग में जाने की भी खूब चर्चा है, लेकिन जैन के अभी रिटायर होने में तीन महीने से भी अधिक समय है और सीएस बनने की दौड़ में शामिल अफसरों ने अभी से जुगाड़ तेज कर दी है। वैसे मप्र के सीएस का फैसला पीएमओ करेगा या मुख्यमंत्री खुद अभी कहना मुश्किल है? यदि केंद्र ने उन्हें पुन: एक्सटेंशन दे दिया तो मजबूरी में मुख्य सचिव के पद पर एक साल और पदस्थ रहना होगा, लेकिन वे एक्सटेंशन लेने की फिराक में नहीं हैं। इससे नए सीएस बनने का रास्ता खुल गया है और मप्र का अगला मुख्य सचिव बनने के लिए दिल्ली से लेकर भोपाल तक अफसरों ने सक्रियता बढ़ा दी है। 89 बैच के अनुराग जैन की केंद्र और राज्य में छवि अच्छी होने की वजह से उनकी सेवाएं और आगे भी लेने सरकार तैयार है, लेकिन इसका फैसला जैन के रिटायरमेंट के एक दिन पहले होने की संभावना है। वैसे सीएस बनने की दौड़ में 1990, 1991 और 1992 बैच के आईएएस दौड़ में शामिल हैं।
बदनाम साहब को कलेक्टरी का ईनाम
किसी-किसी व्यक्ति का भाग्य ऐसा होता है कि उसकी गलतियों को दरकिनार कर उसे ईनाम का हकदार बना देता है। ऐसे ही एक भाग्यशाली 2017 बैच के आईएएस का नाम है। साहब का अब तक का पूरा ही कार्यकाल बदनामी से भरा हुआ है। सूत्रों का कहना है कि साहब जहां-जहां पदस्थ रहे हैं, वहां के सरकारी बंगले से कुछ न कुछ सामान ले ही आए हैं। जैसे नगर निगम में पदस्थापना के दौरान साहब चलाने के नाम पर साइकिल ले गए। फिर उस साइकिल को लौटा दिया। यहीं नहीं मजे की बात है कि साहब अभी हाल ही में जहां पर पदस्थ थे, वहां से करीब सवा सौ आयुष्मान अस्पतालों की मान्यता खत्म कर दी। साहब के इस कदम से शासन-प्रशासन की परेशानी बढ़ गई। मामला इतना बढ़ गया कि साहब पर दबाव आने कारण मान्यता को लेकर 6 महीने का समय दे दिया कि कागज प्रस्तुत करें। साहब की कार्यप्रणाली का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उनके स्टेनो का भी लेनदेन का आॅडियो वायरल हो गया था। लेकिन फिर भी साहब का भाग्य इतना बलवान है कि उनकी सारी गलतियों को दरकार कर सरकार ने उन्हें कलेक्टरी थमा दी?
सेटिंग का खेल खूब चर्चा में
एक मलाईदार विभाग में इन दिनों सेटिंग मॉडल खूब चर्चा में है। मामला करीब 80-85 करोड़ रुपए के वेट का बताया जा रहा है, जो फाइलों में तो दर्ज है, लेकिन जमीन पर उसकी वसूली अब तक अधर में लटकी हुई है। दिलचस्प बात यह है कि जिस शराब कारोबारी पर यह बकाया था, उसका लाइसेंस निरस्त होने की नौबत आने तक विभागीय अफसर कार्रवाई की बजाए मैनेजमेंट में लगे रहे। अब प्रशासनिक गलियारों में चर्चा है कि इतनी बड़ी रकम यूं ही नहीं अटकती, इसके पीछे ऊपर से नीचे तक कोई न कोई सेटिंग चैन जरूर काम कर रही थी। सूत्र बताते है कि समय रहते यदि विभाग सख्ती दिखाता तो करोड़ों की वसूली आसानी से हो सकती थी, लेकिन संबंधित विभाग के साहब ने हर नोटशीट पर ऐसा ब्रेक लगाया कि मामला आगे बढ़ने की बजाए ठंडे बस्ते में चला गया। अंदरखाने में यह भी कहा जा रहा है कि कारोबारी और कुछ अफसरों के बीच अंडर द टेबल समादारी इतनी मजबूत थी कि लाइसेंस निरस्तीकरण तक की कार्रवाई भी सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गई। अब देखना यह है कि उक्त कारोबारी से सरकार 85 करोड़ की वसूली कर पाती है या नहीं?

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