पॉस्को: मप्र की अदालतों में 16 हजार मामले पेंडिंग
एक प्रकरण अदालत पहुंचने में 380 दिन, देशभर में 4.59 लाख मामले
सीताराम ठाकुर, भोपाल। मप्र में पॉस्को एक्ट यानि नाबालिग बच्चियों के साथ होने वाले यौन दुराचार के मामलों में जल्द न्याय मिल सके, लेकिन इस एक्ट के तहत न्यायालयों में पेश होने वाले प्रकरणों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। मप्र की अदालतों में ऐसे करीब 16 हजार से अधिक मामले पेंडिंग हैं, वहीं देशभर में 4 लाख 59 हजार 874 मामले पेंडिंग है। पॉस्को का एक मामला अदालत पहुंचने में ही 380 दिन लग रहे हैं। इसके बावजूद 40 फीसदी अपराधी बच जाते हैं। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हाल ही में छत्तीसगढ़ में हुई मध्य क्षेत्रीय परिषद की मीटिंग में पॉस्को एक्ट के मामले लंबे समय पेंडिंग रहने और इनकी संख्या लगातार बढ़ने का खुलासा हुआ है। वर्तमान में देशभर की अदलातों में पॉस्को एक्ट से जुडेÞ 4 लाख 59 हजार 874 मामले पेंडिंग हैं। इनमें मप्र की अदालतों में 16 हजार 73, छत्तीसगढ़ में 5, 426, उत्तराखंड में 3, 228, उत्तरप्रदेश में एक लाख 19 हजार 890 तथा अन्य राज्यों में 1 लाख 44 हजार 617 मामले न्यायालयों में चल रहे हैं। मप्र की 307 अदालतों में ये मामले पेंडिंग हैं। न्याय मिलने में देरी का एक चौंकाने वाला सच सामने आया है। यहां एक पॉस्को मामले को फास्ट-ट्रैक विशेष अदालत में सुनवाई के लिए भेजने में औसतन 380 दिन लग जाते हैं।
मप्र देश में चौथे स्थान पर
केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की राज्य मंत्री सावित्री ठाकुर ने पिछले दिनों राज्यसभा में बताया था कि पॉस्को और अन्य गंभीर यौन अपराधों के लंबित मामलों में मध्य प्रदेश देश में चौथे स्थान पर है। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार जैसे राज्य इस मामले में मप्र से आगे हैं। हालांकि, एक राहत की बात यह है कि मप्र में औसतन 380 दिन लगने का समय देश के अधिकांश राज्यों से कम है। छत्तीसगढ़ में 333 दिन, आंध्र प्रदेश में 257 दिन और पुडुचेरी में 180 दिन लगते हैं। ये राज्य ऐसे मामलों में सबसे कम समय लेते हैं।
भोपाल की स्थिति भी बेहतर नहीं
बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण देने के लिए बने पॉक्सो (प्रोटेक्शन आॅफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल आॅफेंस) एक्ट के तहत दर्ज मामलों में भोपाल में सजा का प्रतिशत बेहद कम है। पिछले एक साल में अदालतों ने पॉक्सो के 331 मामलों में फैसला सुनाया, लेकिन इनमें सिर्फ 40 मामलों में ही आरोपियों को सजा हो सकी। बाकी 291 मामलों में आरोपी बरी हो गए। वर्तमान में भोपाल की अदालत में पॉस्को के 1240 मामले पेंडिंग हैं। वैसे पॉक्सो अधिनियम, 2012 के तहत यौन उत्पीड़न की शिकार बच्चियों (बालिकाओं) के संरक्षण, पुनर्वास और त्वरित न्याय के लिए विशेष कानूनी सुविधाएं और प्रावधान किए गए हैं। इनका मुख्य उद्देश्य बच्ची को सुरक्षित माहौल, वित्तीय सहायता और सम्मानजनक जीवन देना है।
इंदौर में भी 1084 मामले लंबित
पॉस्को एक्ट के तहत इंदौर जिला अदालत में 1080 मामले, जबलपुर में 393, ग्वालियर में 331, डिंडौरी में 429, खंडवा में 554, रायसेन में 435, रतलाम में 522, रीवा में 392, सागर में 458, सतना में 413, दमोह में 330, सीधी में 233, उज्जैन में 346, विदिशा में 341, बालाघाट में 316, बैतूल में 331, बड़वानी में 215 प्रकरण पेंडिंग हैं, जबकि सबसे कम मामले सिर्फ 34 श्योपुर और 38 उमरिया में लंबित हैं।

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