‘मामा’ की आड़ में भांजे की बल्ले-बल्ले 

सीताराम ठाकुर, भोपाल ।    प्रशासनिक वीथिका में इन दिनों एक ऐसे ‘मामा’की चर्चा है, जो अपने भांजे की आड़ में आईटी कंपनी बनाकर कमाई में जुटे हुए हैं और ‘मामा’ की आड़ में भांजे की बल्ले-बल्ले हो रही है। उक्त मामा मप्र कैडर के सीनियर आईएएस अधिकारी हैं। सूत्रों का कहना है कि उन्होंने सॉफ्टवेयर डेवलप करने वाली एक कंपनी बनाई है। उक्त कंपनी में कर्ताधर्ता अपने ही भांजे को बना दिया है। साहब अपने रसूख और संबंधों का फायदा उठाकर प्रदेश के सरकारी विभागों में अपनी आईटी कंपनी को भांजे के नाम पर काम दिलवा रहे हैं। बताया जाता है कि साहब जब बिजली विभाग में थे, तो उन्होंने वहां कई सॉफ्टवेयर इंस्टॉल करवाए थे। इसके एवज में लाखों रुपए लिए गए। सूत्र बताते हैं कि जिन सॉफ्टवेयर की जरूरत नहीं थी, वे भी वहां इंस्टॉल किए गए थे। जबकि हकीकत में एक-दो सॉफ्टवेयर ही काम आ रहे हैं। बाकी वैसे के वैसे रखे हैं। मामा इतने दिलेर हैं कि कसगजों से डरते नहीं हैं। जबकि अगर कागजों की पड़ताल की जाए तो ये फंस सकते हैं। साहब मूतल: मप्र के ही रहने वाले हैं। इसलिए साहब ने अतिरिक्त कमाई के लिए सॉफ्टवेयर कंंपनी बना ली है, जिसकी चर्चा मंत्रालय में सुनाई दे रही है। 

 साहब को प्रायवेट गाड़ी का शौक 

आईएएस अफसर यानि ब्यूरोक्रेट्स के बारे में अक्सर माना जाता है कि वे ईमानदार, संवेदशील और सरकार हितैषी होते हैं, लेकिन कुछ ब्यूरोक्रेट्स ऐसे भी होते है, जो छोटी-छोटी गलतियां करके पानी फेर देते हैं। ऐसे की एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अपने एक शौक के कारण चर्चा में हैं। यह उनका शौक है या कंजूसी, यह अलग बात है। सूत्र बताते हैं कि साहब का यह शौक प्राइवेट गाड़ी का सबसे ज्यादा है। दरअसल, हर सरकारी अधिकारी को विभाग की तरफ से सरकारी वाहन मुहैया कराया जाता है। साहब को एमपी-02 नंबर वाला सरकारी वाहन मिला हुआ है। लेकिन साहब अक्सर एमपी-04 नंबर वाली गाड़ी में घूमते नजर आते हैं। पड़ताल से पता चला कि साहब ने सरकार की तरफ से मिले वाहन को परिजनों को दे दिया है। उक्त वाहन से उनके परिजन घूमते हैं, वहीं, साहब जिस विभाग में पदस्थ हैं, उस विभाग में अटैच प्राइवेट गाड़ी का उपयोग साहब ने शुरू कर दिया है। वैसे साहब का पुराने विवादों से नाता रहा है, इस कारण प्राइवेट गाड़ी में घूमना उनका शगल बन गया है। जिसकी चर्चा मंत्रालय से बाहर आने लगी है? 

...और हड़ताल करना पड़ा भारी 

पब्लिक से जुडे एक डिपार्टमेंट में राज्य सेवा के एक अधिकारी की पोस्टिंग से खफा अधिकारियों और कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी। ये हड़ताल ‘सरकार’ को नागवार गुजरी। फिर क्या था, साहब ने चुनिंदा अधिकारियों को डिपार्टमेंट की कमान थमा दी। यानि ‘बंदर के हाथ में उस्तरा’! , जिस अधिकारी को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई है, वह चुनिंदा लोगों को ही ओवलॉइज करने में लगे हुए हैं, जबकि इससे दूसरे लोग काफी खफा नजर आ रहे हैं। रोज दफ्तर के बाहर छोटे ‘साहब’ से मिलने वालों की लाइन लगी रहती है, लेकिन साहब इधर-उधर के कमरे बैठकर अपना काम करते रहते हैं। इसी बीच हड़ताल में विरोध के स्वर उग्र करने वाले अफसर के ‘पर’ पूरी तरह कतर दिए गए हैं और जो नए साहब राज्य सेवा से आए है, उन्हें डिपार्टमेंट की अधिकांश जिम्मेदारी से नवाज दिया गया है। अब चाय ढेले से लेकर प्राइवेट और सरकारी दफ्तर में साहब का कारनामों की चर्चा सुनी जा रही है, जिससे मीडिया के कारकून हलकान हैं? 

मेंटेनेंस के नाम पर टपक रही लार

पानी से जुडे एक डिपार्टमेंट में जल जीवन नहीं, बल्कि साक्षात पानी के नाम पर ‘लक्ष्मी’ टपक रही है। आलम यह है कि प्रदेश के 40 प्रतिशत गांवों में दूषित पानी की सप्लाई हो रही है, फिर भी अफसरों और इंजीनियरों की लार मेंटेनेंस के नाम पर मिलने वाले ‘कमीशन’ के लिए टपक रही है। हाल ही में एक बड़े साहब की अध्यक्षता में मीटिंग हुई। चर्चा के दौरान ‘धनवान भैया’ की जुबान से फूल बरसे? पहले मेंटेनेंस के नाम कलस्टर बनाकर गांवों को रखने का प्रजेंटेशन दिया। बड़े साहब का पारा उनके इस हवा-हवाई प्रजेंटेशन से सातवें आसमान पर पहुंच गया। फिर भी भैया नहीं रुके और सच बोल दिया कि गांवों में सरपंच व सचिव स्कीम ट्रांसफर के नाम पर एक-एक लाख रुपए मांग रहे हैं। इस पर वित्तीय प्रबंधन देखने वाले साहब ने ऐसी फटकार लगाई कि सन्नाटा खिंच गया। उन्होंने दो टूक पूछा-क्या इंजीनियर बिना कमीशन के काम करते हैं? मामला बिगड़ता देख ‘हरि’को अपनी योग-निद्रा से बाहर आना पड़ा और बीच-बचाव कर बड़े साहब का गुस्सा शांत किया। लेकिन सच तो यह है कि कमीशन का तीर कमान से निकल चुका था और उसकी गूंज अब तक वल्लभ भवन में सुनाई दे रही है।

जज के यहां हाजिरी लगाना महंगा पड़ा 

यह किस्सा एक बडे आईपीएस का है, जिन्हें खजुराहो में एक जज के पारिवारिक विवाह कार्यक्रम में हाजिरी लगानी पड़ गई। दिलचस्प बात यह कि जज साहब ने उन्हें सीधे न्योता नहीं दिया था, बल्कि उनके एक परिचित ने नंबर बढ़ाने के चक्कर में साहब को आमंत्रण भेज दिया। बडेÞ आईपीएस ने सोचा कि कभी न कभी जज साहब से काम पड़ ही सकता है और बना लिया खजुराहो का टूर। अब मुसीबत यह कि फील्ड पोस्टिंग तो थी नहीं, शाही सवारी और यात्रा की जुगाड़ कौन करे? लिहाजा, इसलिए उन्होंने एक ‘दलाल’ की सेवाएं ले ली। यह दलाल कोई मामूली खिलाड़ी नहीं है, इसके पालनहार व्यापमं कांड के नामी आरोपी रह चुके हैं। खैर, आईपीएस महाशय उस दलाल की लग्जरी गाड़ी में सवार होकर खजुराहो रवाना हुए। रास्ते में खान-पान और विलासिता के जो इंतजाम दलाल ने किए, उनकी चर्चा अब तक महकमे में है। लेकिन जज साहब के यहां जैसे ही आईपीएस शादी में पहुंचे, तो जज साहब ने उनसे उनका नाम और परिचय पूछ लिया। फिर क्या था, साहब का गुस्सा सातवें आसमान पर। यानि कभी-कभी बिना परिचित के यहां शादी में जाना महंगा पड़ जाता है।