सीताराम ठाकुर 

आईएएस ‘मेडम’ के कारण अटकी सूची 

मप्र में लंबे समय से प्रशासनिक सर्जरी की बाट अधिकारी जो रहे हैं। वैसे तो मुख्यमंत्री ट्रांसफर सूची जारी करने की मंशा पूरी तरह बना चुके थे, लेकिन सीएस ने आखिरी महीने के दौरान आबकारी दुकानों की नीलामी, रजिस्ट्री, माइनिंग से होने वाली आय सहित सरकार के बजट खर्च को लेकर इस पर रोक लगा दी थी। यानि अप्रैल के पहले सप्ताह में आईएएस अफसरों की सर्जरी की जाएगी। यहां एक लोचा यह भी है कि तीन जिलों में कलेक्टर मेडम के भी ट्रांसफर होना है, लेकिन इसके स्थान पर किसे पोस्ट किया जाए, इसको लेकर काफी मंथन हुआ। आखिरकार रीवा, ग्वालियर और नर्मदापुरम की मेडमों को चलता करने के लिए नए अफसरों के नाम फाइनल हो गए हैं और सूची में कई अफसरों की चांदी हो जाएगी। हालांकि सीएम चाहते हैं कि छोटी-छोटी सूची जारी की जाएं। बड़ी सूची जारी करने से सरकार की भी किरकिरी होती हैं, इसलिए पहली सूची में करीब दो दर्जन नाम ही समाहित हो सके हैं और यह पिटारा जल्द ही खुलेगा? 

नेताओं और अफसरों में ‘जमीन’ का खेल 

भोपाल के पश्चिमी बायपास के लिए जमीन अधिग्रहण की सूचना ने अच्छे-अच्छों की बल्ले-बल्ले होने वाली है, क्योंकि कई नामी-गिरामी बिजनेसमैन और राज नेताओं ने इस एरिया में पहले से ही जमीनें खरीद ली थीं। इनमें करीब आठ साल एक विभाग के ईएनसी रहे साहब के अलावा कई आईएएस अफसरों ने भी परिवार के नाम पर जमीनें खरीद रखी हैं। भूमि अधिग्रहण के लिए राजस्व विभाग ने जो विज्ञापन जारी किया, उसमें जो नाम सामने आए हैं, वे कहीं से भी किसान नजर नहीं आते हैं? बल्कि बडेÞ रसूखदारों के नाम सामने आए है। ये विशुद्ध निवेशक हैं जो अपनी काली कमाई को सफेद करने में जुटे हैं। इन्हें पहले से ही पता था कि बायपास कहां से निकलेगा, तभी तो कौड़ियों के दाम वाली जमीन आज ‘सोना’ उगल रही है। यानि दो नंबर में खरीदी ये जमीन अधिग्रहण के बाद एक नंबर की हो जाएगी। इस खेल में स्थानीय मंत्री, जमीन का हिसाब-किताब रखने वाले मंत्री, जिला सरकार के करीबी दलाल और सरकार के ‘पायलट’ जैसे रसूखदार शामिल हैं। हालांकि, जिला प्रशासन इनकी कुंडली बनाने में जुटा हुआ है, इसके बाद जमीन का भारी-भरकम मुआवजे का खेल चलेगा? 

बजट का हिस्सा लेने साहब ने भेजी लोकेशन

पानी से जुड़े एक विभाग जो कि बाणगंगा पर स्थित है, में पदस्थ एक चीफ इंजीनियर ने भ्रष्टाचार का ऐसा डिजिटल और ‘स्मार्ट’ तरीका पेश किया है कि वल्लभ भवन में बैठे अफसर भी दंग रह गए हैं। जैसे ही ईएनसी ने जिलों में काम कराने के लिए पैसों के आवंटन का आदेश जारी किया, साहब ने उस सरकारी आदेश के साथ अपने ‘घर की लोकेशन’ सभी इंजीनियरों को व्हाट्सएप भी कर दिया। इससे किसी इंजीनियर पते की गफलत न हो जाए, क्योंकि दफ्तर में तो अन्य इंजीनियर और मीटिंग को लेकर भीड़-भाड़ रहती है। साथ ही आने-जाने वाले पर नजर रखने के लिए पूरे दफ्तर में सीसीटीवी कैमरे लगे हुए हैं। यहां तक साहब भी इन्हीं कैमरों की मदद से किससे मिलना हैं और किससे नहीं, नजर रखते हैं? वैसे साहब ने भ्रष्टाचार नहीं करने की कसम ‘खा’रखी है, लेकिन फील्ड में पदस्थ इंजीनियरों से वे कमीशन धड़ल्ले से वसूलते हैं और यह कमीशन विभाग के बडेÞ साहब को भी पहुंचता है, जबकि छोटे अफसरों को केवल पानी ही मिल पाता है, जिसकी चर्चा मंत्रालय में भी सुनाई दे रही है। 

लगा ओएसडी को दाग

 फिल्म दिल ही तो है का यह गीत-‘लागा चुनरी में दाग छुपाऊ कैसे’...सुना होगा। ऐसी ही कुछ स्थिति प्रदेश के एक कद्दावर मंत्री की है। उन पर ओएसडी का दाग लगा हुआ है। देखने-सुनने में तो मंत्रीजी काफी ईमानदार कहे जाते हैं, लेकिन उनके आसपास ऐसे लोगों का घेरा रहता है जिसके कारण अक्सर वे विवादों में फंस जाते हैं। वर्तमान में मंत्रीजी के पास दो बडेÞ विभाग हैं, उनमें से एक विभाग काली कमाई का गढ़ माना जाता है। ऐसे में मंत्रीजी को एक ऐसा ओएसडी मिला है, जो उनके नाम पर जमकर खेला कर रहा है। बताया जाता है कि उनके ओएसडी का रसूख ऐसा है कि उसे देखकर बडेÞ-बडेÞ अधिकारी जलने लगते हैं। खासकर ओएसडी दो-तीन तोला सोने की चेन पहनते हैं। मंत्री के ओएसडी राजधानी के एक बडेÞ होटल में मंत्री पुत्र के साथ अपना अधिकतर समय बिताते हैं। सूत्रों का कहना है कि वे वहीं अपना दरबार लगाते हैं और उस दरबार में पहुंचकर लोग अपने उल्टे-सीधे काम करवाते हैं। इसके लिए ओएसडी बड़ी दक्षिणा भी वसूलते हैं, इसलिए वह दूसरे अफसरों की किरकिरी बने हुए हैं? 

बड़ी कुर्सी के लिए 10 करोड़ की बोली 

मप्र में वैस्से तो सरकार का पूरा फोकस सुशासन पर है, लेकिन बड़ी-बड़ी सरकारी कुर्सियों के लिए अधिकारी मुंह मांग रकम देने के लिए बेताब नजर आते हैं। पूर्ववर्ती सरकार के समय इस कुर्सी के लिए 5 करोड़ तक की बोली लगती थी, लेकिन अब ये बढ़कर 10 करोड़ हो गई है। सूत्रों का कहना है कि निर्माण कार्य करने वाले एक कमाऊ विभाग में इन दिनों बडेÞ इंजीनियर की कुर्सी पाने के लिए दो इंजीनियरों में ठनी हुई है। एक साहब उक्त कुर्सी पर बने रहने के लिए बोली लगा रहे हैं, तो दूसरे कुर्सी पाने के लिए 10 करोड़ तक देने को तैयार है? वैसे कुछ समय पहले ग्वालियर से आए एक इंजीनियर ने भी यह कुर्सी पाने के लिए बडेÞ साहब तक पहुंच बनाई, लेकिन दाल नहीं गली। अब यहीं पर नीचे पदस्थ अफसर इस कुर्सी को पाने के लिए अपने राजनीतिक कौशल का इस्तेमाल करने में जुटे हुए हैं। हालांकि इस विभाग में काली कमाई जमकर होती है और इसीलिए इस कुर्सी पर बैठने के लिए ंइजीनियरों में होड़ मची हुई है। वैसे मंत्री के खास इंजीनियर अभी काबिज हैं और दूसरे इंजीनियरों की सूची सीएम सचिवालय में पेंडिंग पड़ी हुई है।