बिना जांच के महिला अफसरों को हटाया 

 सीताराम ठाकुर, भोपाल।  अधिकारियों तथा कर्मचारियों द्वारा दो महिला आईएएस के खिलाफ दिए गए धरने और आरोप-प्रत्यारोप के बाद सरकार ने इन दोनों महिला आईएएस डायरेक्टर को पद से हटाकर लूप लाइन में तो पदस्थ कर दिया है, लेकिन महिला आईएएस अफसरों द्वारा अपने पक्ष में दिए गए तर्क तथा उत्तर को दरकिनार कर कर्मचारियों द्वारा की गई शिकायतों के आधार पर इन्हें हटा दिया गया। एक महिला आईएएस डायरेक्टर के रूप में पोषण आहार से जुड़ा काम देख रही थीं, तो दूसरी आदिवासी विकास योजनाओं का। इनके द्वारा काम नहीं करने वाले अधिकारियों को नोटिस दिए जाने की चेतावनी देने पर ही दोनों विभागों के अधिकारियों ने मिलकर इन दोनों के खिलाफ मुहिम चलाई। जबकि सरकार को चाहिए था कि दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद निर्णय लिया जाना चाहिए था, लेकिन सिर्फ आंदोलन करने पर महिला आईएएस अफसरों को हटाने पर अब सवाल उठ रहे हैं। इस मामले में अब विभाग के ही कर्मचारी दोनों महिलाओं के पक्ष में बात करते नजर आते हैं? 

बडे साहब के भंजे की बल्ले-बल्ले 

एमपीआरडीसी में पदस्थ प्रशासनिक अधिकारी बडेÞ साहब के भांजे लगते हैं। इनके खिलाफ आ ये अधिक संपत्ति के मामले में आर्थिक अपराध अन्वेषण एजेंसी (ईओडब्ल्यू) में जांच चल रही है। आय से अधिक संपत्ति जुटाने की शिकायत होने पर इन्हें मुख्य धारा से हटाकर लूपलाइन में पोस्ट कर दिया गया, लेकिन ‘मामा’जैसे ही मप्र के बडेÞ साहब बने भांजे की जांच ठंडे बस्ते में डालते हुए उन्हें (भांजे) को पुन: पावरफुल पोस्टिंग दे दी गई। सूत्र बताते है कि बडेÞ साहब ने भी भोपाल में काफी संपत्ति जुटा रखी है। उन्होंने एक कॉप्लेक्स भी बनवाया था, जिसे बाद में बेच दिया गया। अब चर्चा है कि बडेÞ साहब एक बडेÞ टाइगर रिजर्व के पास अपना रिसोर्ट बनवा रहे हैं। यानि मामा-भांजे दोनों मिलकर कमाई करने में जुटे हुए है। सड़क निर्माण से जुडेÞ इस निगम में अब अन्य अधिकारी ‘भांजे’ के अधिकार वापस मिलने से खफा नजर आ रहे हैं। उनका कहना है कि भांजे ने पहले से ही भोपाल मे ंदो-तीन संपत्ति खरीद रखी हैं और अब ‘मामा’ के बडेÞ साहब बन जाने से भांजे की बल्ले-बल्ले होने लगी है। 

क्लीनचिट देने मुखिया का हस्तक्षेप 

ग्वालियर नगर निगम में हुए फर्जीवाडेÞ और आर्थिक सहायता बांटने के मामले में आरोपी बनाए गए तत्कालीन तीन आईएएस अधिकारियों सहित महापौर रहीं ‘समीक्षा’को क्लीनचिट देने पर लॉ डिपार्टमेंट ने आपत्ति लगा दी थी। जीएडी से यह फाइल करीब तीन महीने से लॉ में पेंडिंग पड़ी हुई है, जिसके कारण तत्कालीन महिला महापौर को एक आयोग में नियुक्ति नहीं मिल सकी। साथ ही तीन आईएएस अफसरों में से दो रिटायर्ड हो चुके हैं और एक आईएएस दिल्ली में पदस्थ हैं। अब तीनों को क्लीनचिट देने की फाइल उच्च स्तर से लॉ डिपार्टमेंट को भेजी गई है। सूत्र बताते है कि संगठन के दबाव के कारण प्रदेश के मुखिया ने महिला महापौर को क्लीनचिट देने के लिए अफसरों से कहा है और इसके चक्कर में तीन आईएएस को भी क्लीनचिट देने की तैयारी कर ली गई है। वैसे इस मामले में लोकायुक्त में मामला दर्ज है और उसने इनके विरुद्ध अभियोजन की अनुमति सरकार से मांग रखी है, लेकिन अब इन बचाने के लिए सरकार ने मुहिम तेज कर दी है, जिससे एक आयोग में खाली पडेÞ एक सदस्य के पद को भरा जा सके। वैसे दो रिटायर्ड आईएएस काफी पहले ही भाजपा से जुड़ चुके हैं, इसलिए भी संगठन इन्हें क्लीनचिट देने दबाव बनाने में लगा हुआ है? 

चौकड़ी के चक्कर में फंसे मंत्री 

चौकड़ी यानि दलालों की फोज! सरकार के एक प्रमुख डिपार्टमेंट के मंत्री इन दिनों से चौकड़ी में बुरी तरह फंसे हुए हैं। इनमें एक विभाग का ही कार्यपालन यंत्री है तो ‘कुशवाह,ठाकुर’मंत्री की दलाली करने में लगे हुए हैं। बिना चौकड़ी के विभाग में किसी भी इंजीनियर की पोस्टिंग नहीं हो पाती। इस चौकड़ी ने इंजीनियरों की पोस्टिंग के नाम पर लोगों से पैसे भी वसूल लिए है, लेकिन उन्हें पोस्टिंग नहीं मिली। यहां तक इस चौकड़ी में फंसे एक उप सचिव को बलि का बकरा बना दिया गया? इस मामले में एक चीफ इंजीनियर की भूमिका भी नजर आ रही है, जो यदा-कदा मंत्री को राह दिखाने की काम करते है। सूत्र बताते है कि इन महाशय ने कई बार मंत्री को अनेक सु­ााव भी दिए और इन पर अमल भी हुआ, लेकिन आखिर में नुकसान मंत्री को ही उठाना पड़ा। अब चौकड़ी के जाल में फंसे मंत्री की बदनाम काफी हो रही है। महाकौशल क्षेत्र से आने वाले इन मंत्री के बारे में ईमानदारी का डंका बजाया जाता रहा है, लेकिन चौकड़ी के चक्कर में मंत्री भी बारे-न्यारे करने में लगे हुए हैं, जिसकी चर्चा मुख्यालय से निकलकर मंत्रालय तक सुनाई देने लगी है। 

रिटायर्ड अफसर की बल्ले-बल्ले 

एक इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट से जुडेÞ विकास निगम में सलाहकार के रूप में पदस्थ पूर्व ईएनसी की बल्ले-बल्ले हो रही है। टेंडर से लेकर सारे काम ये महाशय संभाल रहे हैं, जबकि ये खुद स्वयं के पास कोई काम नहीं होने का ढोंग पीटते नजर आते है? वैसे इनकी संविदा नियुक्ति जल्द समाप्त होने वाली है, लेकिन फिर इन्हें संविदा दिए जाने की तैयारी सरकार ने कर ली है। सवाल ये उठ रहा है कि लोकायुक्त में इनके विरुद्ध पांच मामले दर्ज थे, जिनमें से दो में इन्हें क्लीनचिट मिल चुकी है और तीन मामले अभी भी पेंडिंग होते हुए सरकार ने इन्हें संविदा नियुक्ति पर सलाहकार कैसे बना दिया। इस पर विभाग के इंजीनियर ही सवाल उठा रहे हैं। वैसे निगम में एक रेगुलर अधीक्षण यंत्री को ईएनसी का प्रभार दे रखा है और इनके पास कोई अधिकार नहीं है। केवल इंजीनियरों की पोस्टिंग का काम ही ये संभाल रहे हैं या फिर सरकारी योजनाओं की मॉनिटरिंग काम दे रखा है और पूरे अधिकारी निगम में रिटायर्ड इंजीनियर सलाहकार के पास हैं और इनकी बल्ले-बल्ले जमकर हो रही है, जिसकी चर्चा ईएनसी मुख्यालय में होने लगी है।