प्रशासनिक गलियारा -- ‘हम सफर’ की आड़ में लाभ उठा रहे अफसर 

‘हम सफर’ की आड़ में लाभ उठा रहे अफसर 

 मोहन सरकार में उज्जैन में एक समय पदस्थ रहे अफसरों की बल्ले-बल्ले हो रही है। इन अफसरों को महत्वपूर्ण पदों पर जहां पोस्टिंग मिल रही है, वहीं कुछ अफसर सीएम के साथ ‘हम सफर’पढ़ाई करने की आड़ में भी विभिन्न पदों पर रहते हुए लाभ उठाने में लगे हुए हैं। कुछ अफसर तो स्वयं को मुखिया का खासमखास बताने का भी दंभ भरते हैं। इसके चक्कर में पब्लिक परेशान है, क्योंकि जनकल्याण से जुडेÞ जनता के काम नहीं हो रहे हैं, वहीं कुछ अफसर अपनी मनमर्जी से सरकार चला रहे हैं। इन्हें रोकने, टोकने वाला कोई नहीं है। प्रशासनिक मुखिया भी इनके आगे बौने साबित नजर आ रहे हैं। उधर, मंत्रालय और विंध्याचल में बैठने वाले कई अफसरों ने तो लंच के बाद दफ्तर आना ही छोड़ दिया है। ये अफसर कृषि, स्वास्थ्य, पेयजल, सिंचाई और जनजातीय कार्य विभागों से जुडेÞ हुए है? 

फील्ड की आड़ में बना कमाई का जरिया 

केंद्र सरकार के फंड से अरबों-खरबों का प्रोजेक्ट चलाने वाले एक विभाग के पीएस और ईएनसी फील्ड का दौरा करने की आड़ में कमाई करने में लगे हुए हैं। इनकी जुगलजोड़ी सप्ताह में तीन दिन संभाग और जिलों में फर्जीवाड़ा पकड़ने के नाम पर निकलती है और भ्रष्टाचार में फंसे अफसरों पर नकेल कसने की आड़ में खेल करने में लगी हुई है। बल्कि ईएनसी को तो दो-दो जिम्मेदारियों से नवाजा गया है, जिससे उनके दोनों हाथों में लढ्डू है। इसके चलते ईएनसी ने तो पब्लिक और मीडिया दोनों से दूरी बना ली है। यदि इनसे किसी भ्रष्टाचार, लापरवाही और जनकल्याण से जुड़ी योजना के बारे में जानकारी मांगना चाहे तो यह लोगों से मुख्यालय पर भी नहीं मिलते हैं। साहब महाशय ने मंत्री की जांच के लिए नोटिस दिया, लेकिन सरकार ने इनके विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की, तबसे इन्होंने पब्लिक से भी दूरी बना ली है। वैसे इस मामले में बडेÞ साहब भी कमेंट्स कर चुके हैं। 

 कप्तान साहब का बाल भी बांका नहीं हुआ 

महाकौशल क्षेत्र के एक जिले कुछ पुलिस अधिकारियों-कर्मचारियों द्वारा करोड़ों रुपए के हवाला कांड में गोलमाल किया था। जब इस गोलमाल का पर्दाफाश हुआ तो इसमें करीब दर्जनभर पुलिस अधिकारियों की मिलीभगत के सुराग मिले। जिस आधार पर न केवल 11 पुलिसकर्मियों की गिरफ्तारी हुई, बल्कि उन्हें जेल की हवा भी खानी पड़ी। लेकिन विडंबना यह है कि कप्तान साहब का बाल भी बांका नहीं हो पाया। सूत्रों का कहना है कि कप्तान साहब ही नहीं उनका पूरा परिवार काली कारतूतों में लगा हुआ है। लेकिन इसके बावजूद उनके खिलाफ अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हो की गई है, जबकि कई जिलों में ऐसी घटनाओं पर सबसे पहले डीएम और कप्तान साहब की छुट्टी कर दी जाती रही है। यह स्थिति तब है, जब पुलिस विभाग के बडेÞ साहब ईमानदार छवि के अफसर हैं, लेकिन आरोप लग रहा है कि बेईमान अफसरों को उनका आश्रय मिल रहा है? 

 अटक गई हाईवे की फाइल 

मप्र सरकार की बहुप्रतीक्षित भोपाल-इंदौर एक्सप्रेस हाईवे की रफ्तार शुरू होने से पहले ही थमती नजर आ रही है। इसकी वजह यह है कि इस एक्सप्रेस हाईवे की फाइल दिल्ली दरबार में अटक गई है। खासकर भोपाल-इंदौर इस हाईवे के आसपास की जमीनें अफसरों और नेताओं ने औने-पौने दाम पर खरीद ली, जिससे वे हाईवे बनने के बाद इसका फायदा उठा सकें। इसकी भनक दिल्ली दरबार को भी लग चुकी है। सूत्रों का कहना है कि मप्र के किसी अधिकारी ने भी इस दिशा में दिल्ली दरबार में कोई हाजिरी नहीं लगाई। इसलिए फाइल अटकी हुई है। लोगों का कहना है कि इसकी स्थिति वेस्टर्न बायपास जैसी न हो जाए। गौरतलब है कि जब वेस्टर्न बायपास की पहली डिजाइन फाइनल हुई थी, तो सबसे पहले इसकी भनक नेताओं और अधिकारियों को लगी थी। फिर इसकी दूसरी डिजाइन भी बनी। 

 जमीन नहीं, कागजों पर कांग्रेस नेता 

 मप्र कांग्रेस के नेता या मीडिया से जुडेÞ लोगों जमीन से जुडेÞ मामले उठाने की अपेक्षा अखबारों में छपे मुद्दों को ही ज्यादा तवज्जो दे रहे हैं। कोई भी मुद्दा अखबार में छपा, वे उसे लपक लेते हैं और बयानबाजी में लग जाते हैं। इससे फील्ड और जमीनी स्तर पर कांग्रेस नेताओं की पकड़ ढीली पड़ती जा रही है। बड़ा नेता हो या मीडिया से जुड़ा प्रवक्ता सभी अखबारों की कटिंग पर ज्यादा भरोसा करते हैं। वहीं कांग्रेस से जुडेÞ रहे सीनियर लोगों का कहना है कि कांग्रेस जमीन पर अभी भी नहीं उतर पा रही है। इसके कारण ही वह मप्र में 20 साल से सरकार नहीं बना पा रहे। आखिर यहां सभी नेता बन चुके हैं और पब्लिक के बीच जाना और उनके मुद्दे उठाना कांग्रेस भूल ही चुकी है, जिसका नतीजा है कि लगातार कांग्रेस की जमीन खिसकती जा रही है?